Friday, May 2, 2025

जंगल के दावेदार महाश्वेता देवी का लिखा बिरसा मुंडा पर जीवन वृत


उलगुलान का अन्त नहीं हुआ

 

बांसवाडा शहर से चालीस किलोमीटर दूर एक गाँव जाने को निकले. मुख्य मार्ग से दस किलोमीटर अन्दर एक ही नदी पर बने सात पुल को पार करके पहाड़ों के  मध्य बसे गाँव को पहुचें. वहा सीधे मार्ग पर लगा एक बोर्ड देखा जिसपर लिखा था बिरसा मुंडा मार्ग.

     बिरसा के शहीद होने के 125 वर्ष बाद इस आदिवासी बहुल गाँव में बिरसाइत है, भगवान बिरसा जीवित है उनकी जंगल की दावेदारी भीलों में जल रही है. बिरसा के शहीद होने के बाद ब्रिटिश सरकार ने सोचा था की उलगुलान खत्म हो जायेगा वे असफल रहे आज भी क्रांति जिन्दा है.

     9 जून 1900 की सुबह को विचाराधीन कैदी बिरसा मुंडा शहीद हो गए. कारणों पर अभी भी संदेह है कागजों में हैजा बताया गया लेकिन हैजा के संकेत नहीं थे और मुंडाओं की परम्परा के अनुसार उनको दफनाया नहीं गया वरन अग्नि संस्कार किया गया जिससे सारे सबूत नष्ट हो गए.

    बिरसा ने जब उलगुलान शुरू किया उससे पूर्व अनेक सभाए की लोकतान्त्रिक तरीके से लोगों  को पूछा शांति मार्ग से चले की क्रांति मार्ग से ? उन्होंने लोगों को बताया की शांति की राह पर जाने से कितने दिनों में फल मिलेगा यह पता नहीं क्योंकि  उस राह पर चलने से काम पूरा होने में समय लगता है और दूसरा मार्ग है लड़ाई की राह. उसमे भी कांटे है जिसमे तकलीफें और भी ज्यादा है हो सकता है की देह तक छोडनी पड़े. भूखों मरना पड़े, जेल जाना पड़े लेकिन दूसरी कोई राह भी तो नहीं है तब लोगों ने सहमती दी.

    बिरसा ने लोगों को यह भी कहा की हमारे सब पुरखें जब मुंडा समाज में, मुंडा राज में थे वे नमक मिलने पर भी बराबर की हिस्सा पाते ,सोना पाने पर भी बराबर का हिस्सा पाते थे. साम्यवादी व्यवस्था की बात करने वाले बिरसा ने अपनी शिक्षा चाइबासा के जर्मन मिशन स्कूल में प्राप्त की थी अंग्रेजी भी पढ़े थे.

    एक बार आनन्द पण्डे के पास जाकर जनेऊ पहना, चन्दन लगाया,तुलसी की पूजा की. रामायण, महाभारत और पूराण सुने भगवान के गीत गाए लेकिन सुगाना – करमी का बेटा बिरसा अलग ही मिटटी का बना था उसने कहा  हम लोगों के भगवान अलग है हम सिंबोडा की प्रजा है हरमबो  हमारे आदिपुरुष है. सरकार के खिलाफ अर्जी देने के कारण आनन्द पांडे ने उसको निकाल दिया.

    व्यकतित्व का धनी बिरसा ने जनचेतना जाग्रत की. मुंडाओं में अपनी भूमि, अपना जंगल का भाव जगाया, उलगुलान शुरू हो गया लेकिन दुखद यह रहा की उसके ही समाँज के 6 मुंडाओं ने तमरिया माझी के कहने पर और दिकु शशिभूषण राय के साथ मिलकर उसे पकडवा दिया. इतिहास में लिखा है की परमी जो बिरसा के साथ रहती थी उसने बिरसा की आग नहीं जलाने, धुँआ नहीं उठने देने की बात नहीं मानी और भात पकाने के लिए आग जला दी उसे लगा की भात पीस-पीसकर, पानी पीकर, बेस्वाद खाकर बिरसा तंग आ गया है 500 रूपये के लालच में उसे पकडवा दिया.

    मुंडारी  बोलने वाले, सीधे सादे मुंडा ब्रिटिश ला को नहीं समझते थे 482 मुंडाओं  को गिरफ्तार किया गया इन मेसे 98 मुंडाओं  को सजा मिली जिसमे से  40 को आजीवन काला पानी की सजा हुई. बिरसाईत कहते थे भगवान ने मुझे कहा था में  अगर बिजली बनकर गिर जाऊ तो तुम लोग डरोगे, अगर बाघ बनकर लोटा  तो तुम डरोगे, अगर जानवर बनकर लौटा तो तुम लोग मुझे पहचानोगे नहीं, इसलिए में  मानुस होकर लौट आऊंगा नइ  धरती बनाऊंगा.

    बिरसा वापस लौट आये है सशरीर नहीं अपने विचारों के साथ और दूरस्थ गांवों तक पहुच गए है.

 

भारत दोसी

गाँधी सद्भावना सम्मान प्राप्त लेखक

9799467007