Wednesday, March 16, 2016

bharat doshi ke prem patra 3


 प्रिय ,
         

         क्या मैंने तम्हे इसलिए ऊंच -नीच कही की मैं ईष्या ,जलन से भर गया था की मुझे लगा की मैंने तुम्हे  दिया है की मैंने तुम पर अविश्वास   किया तुम दूसरे की हो गई हो।
       क्या मैं  तुम्हारे और उसके बीच आया।  मेरा प्रेम क्यों असुरक्षित हो गया जब मुझे पता लगा की तुम उसके साथ हो गई हो।  मुझे लगभग छोड़ने का निर्णय कर चुकी हो।
      मैं  जनता हूँ तुम्हे मुझसे प्रेम नहीं है कभी था भी नहीं .... पर मुझे यहाँ सच नहीं  लग रहा  बहुत झुकाव तो तुम्हारा मेरी तरफ था ही।
     मैं तुमको बता दू की मैं देह का  पुजारी नहीं हु देह मेरी प्राथमिकता  कभी नहीं रही मैं तो प्रेम, स्नेह , अपनांपन , लगाव से दिल से जुड़ता हूँ।  इसलिए  उसकी तरफ जुड़ गई तो मेरा दिल  गया मेरा अस्तित्व  गया।
     मेरे जैसे लोगों के जीवन में आंसुओ से दोस्ती रहती है क्युकी मेरे जैसे लोग पसंद आनेवालों के साथ  जुड़ जाते है जब दिल टूटता है तो भीतर दरिया बहने लगता है।
     हर पल  तुम्हे याद कर रहा हु। हर पल तुम्हारे साथ जी रहा हूँ हर पल मर  रहा हु।  हर  देखने  चाहत है तुम्हारे साथ जीने की तमन्ना है।  मोबाइल पर हाथ है करू कॉल पर दिमाग  रोकता है अब पहली कॉल तुम करोगी..... तुम करोगी तभी...... और कही इंतजार में जीवन  गुजर जाए
 

                                                                                                          सिर्फ तुम्हारा
     

bharat doshi ke prem patra 2

 

प्रिय ,
           

              मुझे उस दिन ही समझ लेना चाहिए था की तुम मुझसे  प्रेम नहीं करती जब तुमने कहा  जाओ -जाओ  मैं तुम्हारे साथ नहीं आ रही, उसके साथ आ रही हूँ।  मैंने मन था की यहाँ अस्थाई है।  फिर दूसरे दिन मैंने तुम पर लगे आरोपों या कहे अफवाह की सुनी तो विचलित हो गया।  तुम ऐसी नहीं हो फिर तुम पर क्यों आरोप लग्र क्यों तुम्हे बदनाम किया गया ? किसने किया ?कई बाते  मेरे दिमाग में आई।  दिल ने कहा तुमसे बात करू पर नहीं की जा तुम रास्ते में दिख गई और मेरे रुकने   के  बाद ,बात करने के आग्रह पर भी रुखाई दिखाई तो मैं क्षुब्द हो गया।
     मैं  समझ नहीं सका तुमने ऐसा क्यों किया ? वो साथ था पर तुम्हारी क्या मज़बूरी थी क्या रिश्ते इतनी निर्ममता से तोड़े जाते है।  खैर मैंने सोच की तुम न समझ हो ,बचपना है, सही-गलत , अच्छा-बुरा नहीं जानती इसलिए ऐसा किया। मैंने अपना मन बहला लिया।
     फिर दूसरे दिन मैंने तुमको कॉल किया तुमने कहा " मैं  किसी से बात नहीं करती, बैठकर नहीं करना चाहती।  हीर भी मैं ने बार-बार आग्रह किया तुम मान  गई। मैंने तुम्हे ऊँच -नीच, महिलो की सामाजिक स्थिति ,एक बार बदनामी के बाद मुश्किल जैसी बाटे बताई पर तुमने एक न सुनी वर्ण मुझे छोटा ही कर दिया।
      और तो और मेरी कही बाटे उसे बता दी।  मैं तो तुम्हारी भलाई  चाहता था पर तुमने सोचा मई तुम्हारी जुदाई के दर से यहाँ कह रहा हूँ।  अगले दिन फिर हम मिले मैंने फिर कुछ उदाहरण से बताया पर..... .
      परन्तु आज कितने ही दिन बाद जब मैंने तुमसे बात नहीं की है तुमसे दूर हूँ देखा भी नहीं है फिर भी भीतर ही भीतर रो रहा हूँ क्यों  मैं तुम्हे वह नहीं समझा सका।  क्या मई प्यार  नहीं सका।
                                                                                                                         सिर्फ तुम्हारा
     

bharat doshi ke prem patra 1

                   फिर भी तुम्हारा स्वागत है००००


प्रिय ,
             
           उम्मीद है तुम दिल से स्वस्थ होगी क्योंकि तुमने जो किया वह दिमाग से किया लगता है पर मेरा दिल और दिमाग दोनों छला हुआ है।  मैं ठगा हुआ महसूस कर रहा हूँ।
          मेरी जानकारी ,याददाश्त में मैने तुम्हारे साथ कभी बुरा नहीं किया।  शब्दों से भी तुम्हारा दिल नहीं दुखाया अपना पुराण प्यार ,स्नेह , सम्मान ,बराबरी तुमको दी।
          जब भी तुम मेरे साथ बैठी विशेष रूप से बाइक पर तभी तुम्हे मैंने उसके मिरर में देखा।  सीधे तो झलक ही देखी और मिरर में भी तुम्हारी आँखे ही देखि क्योकि मुँह स्टाल से हमेश बंधा ही रहता था।  तुमसे मैंने कभी कुछ नहीं चाहा और तुमने कभी कुछ देने को नहीं कहा।
          तुम्हारे साथ से सफर सुहाना था।  दिनभर के तनवसे, थकन से मुक्ति थी ,हंसी- मजाक थी. पता नहीं क्या जादू था तुम्हारे साथ में की हर दुःख से दूर हो जाता था। जीवन सरल होकर निर्मल, निराल प्रवह में बाह रहा था।
         लेकिन यह सब मेरी तरफ से ही था तुम्हारी तरफ से तो सब कुछ सोचा समझा था।  तुम्हारे लिए मैं एक साधन मात्र था और जैसे ही तुम्हें मेरा विकल्प मिला तुमने मुझे मक्खी की तरह निकालकर फैंक दिया।  तुमने तो कहा भी था की तुम यूज़ एंड थ्रो में विश्वास करती हो तुमने तो मुझे ठोकर भी मारी थी।  गलती तो मेरी है जो मई तुम्हे समझते हुए भी न समझ बना रहा।  मैं  दीवानगी में दिमाग  को भूल गया बस दिल से तुम्हारे बारे में सोचता रहा।
       सच कहुँ तुम मेरे जीवन में वापस आओगी तो मैं तुम्हें इतना जलील होने के बाद भी ठुकरा नहीं सकूंगा कोई प्रश्न नहीं कर सकूँगा  पूछ नहीं सकूँगा की तुमने मेरे साथ ऐसा क्यों किया।  शायद मेरी प्रकृति ही प्रेम है, स्नेह है, सम्मान है.... .
       मैं  जनता हूँ  जीवन मई आगे भी इसी तरह से ठगा जाऊंगा पर मै तैयार हूँ यही प्यार है और तुम्हारे जीवन में इससे दूर -दूर  तक कोई लेना -देना नहीं है।
       फिर भी मैं भी अपने जीवन में तुम्हारा सम्मान करुगा ....  प्रतीक्षा में....

                                                                                                                        सिर्फ तुम्हारा