Thursday, July 12, 2018

yermihtna - ek mahan gotul

येरमिहतना
एक महान गोटुल
    - भारत दोसी
     येरमिहतना का अर्थ होता है जन्म के पश्चात माँ के हाथों प्रथम स्नान।  इसी नाम से बस्तर के एक गोटुल का नाम है जो एक विधास्थल है और इसको ही आधार बनाकर गोंडवाना ता पठारी ने ये कथा लिखी है जो बस्तर के आदिवासियो की संस्कृति से हमे परिचित करवाती है साथ ही आज वहा चल रहे नक्सलवाद का सामान्य परिचय कराती है। 
       गोटुल को लेकर कई कथित विद्द्वानो ने पुस्तके को कहानिया लिखी है जिसे लेकर समाज में कई भ्रम है इसको ये कथा साफ करती है।  गोटुल संस्कृति की रक्षा , संरक्षण , संवर्धन के केंद्र रहे है जो सह शिक्षा देते थे और अनुशासन था जहा प्रेम होने पर मान्यता थी  जैसा की बीर और कोयना में था।  जो शहरी, पुलिस षड्यंत्र के कारन अधूरा ही रहा। 
   आदिवासी समाज की सामूहिकता, को तो यह कथा बताती ही है वहा प्रचलित शब्दों के अर्थ भी बताती है जो संस्कृति की प्राचीनता और महानता को बताती है।
 कथा का प्रवाह है जिससे एक बार में पढ़ने का मन होता है जिज्ञासा होती है और पढ़ते ही जाते है।  संविधान में दी गई 5 वी  और 6 ठी अनुसूची को भी स्पष्ट किया गया है जो आजकल चल रहे पथलगढ़ी को साफ करती है। वही कथा आदिवासियों को पूर्वधर्मी (धर्मपूर्वी व्यस्था , पुनेम ) बताते हुए आज के धर्म और उसके पाखंड, अन्धविश्वास, उपयोग को हमारे सामने रखती है। 
   सत्ता कैसे उतखनन के लिए धर्म और पूंजी का गठजोड़ करती है फिर हत्याएं करती हो और नक्सल कैसे लोगो के हित को समझने वालो को मरती है , कैसे पुलिस निर्दोष को नक्सल कह मारती है ये सब इस कथा में है आप इसको जरूर पढ़ेंगे इसलिए ज्यादा गहराई से नहीं लिखता हूँ ये कथा पुस्तक अमेज़ॉन पर उपलब्ध है। 
9799467007
   

Thursday, March 1, 2018

hath dhulai sanskrati me hai

हाथ धुलाई संस्कृति में
   ढूंढोत्सव पर आदिवासी परिवार में भोजन करने जाने का अवसर मिला हम मेहमान पन्क्तिओ में बैठे तो उस परिवार का एक युवा खाली तगारा और पानी भरा लोटा लेकर आया और हाथ धुलवाने लगा।  मैं आश्चर्य चकित था मेहमानो के आदर- सत्कार की इस परम्परा से अभिभूत रह गया।
    हमारी सरकार विद्यार्थीओ को भोजन से पहले हाथ धोना चाहिए का संदेश देने के लिए 6 स्टेप का सितारों , खिलाड़ियों से प्रचार करवा रही है करोडो खर्च कर साबुन से हाथ धोने को कह है वही कुछ संस्कृतियों में यह परम्परा हजारो सालो से है।  सांस्कृतिक रूप से श्रेष्ट समाजो की तरफ भी देखा जाना चाहिए।
- भारत दोसी 

Saturday, February 24, 2018

lekh- fagan : ashlil ke gayan

लेख - अश्लीलता के गायन
संस्कृति का अंग है मनोरंजन
    होली मौसम बदलने का त्यौहार है सिर्फ रंग ही नहीं गीत भी मादकता बरसाते है भिगोते है।  ग्रामीण क्षेत्रो में तो दिन-रात स्वर लहरिया बिखरती रहती है वही चंग, ढोल, कुण्डी, थाप आदि बजती रहती है।  दक्षिणी राजस्थान के वागड़ क्षेत्र में यह उत्सव गायन के माध्यम से उन्मुक्तता फैलाता है इसमें युवक-युवतिया अपनी इच्छा , लालसा, तृष्णा को गीत के माध्यम से व्यक्त करते है इसे मनोविज्ञान भी कहा जा सकता है जहा दमित इच्छाएं सामने आ जाती है कह दी जाती है और "होली है " कहकर बुरा भी नहीं माना जाता है।
   वागड़ी के गीतों के बोल प्रेमी -प्रेमिका की छेड़छाड़ को बताते है जिसमे कई बार खुलापन है, सेक्स है, अश्लीलता है -
*  कमरा माँ सोदिरिया , कमरों डगिरियो ऐ 
    बापा झाने मारे सोरी तराई करे ऐ 
* कुकड़ो भी वेडी जाणु 
  बोकडो भी वेडी जाणु 
  वेवण तारो भो.... 
  में नी जाणु  
*नानी -नानी नणदे में छाती माते मोटा मोटी किदी 
  परनियो मने डरावे मारो घंटो डरे ऐ हारे  
    वागड़ी के गीतों में वेवण - विवाई का रिश्ता महत्वपूर्ण है ढुँढोत्सव में इन पर दोनों पक्ष जम के गीत गाते है जो गालियों  से भरे होते है -
*वेवण ने सोदी सोविस घंटे रमी आयो  
  ते जा तारो सोंदि वाटे रमतू ऐ  
  वेवण वैसी सोविस घंटा रमई आयो 
  वेवण जाणे मारो हीरो हंसो लगे ऐ 
*नरवारी ने बस स्टैंड माते 12 -13 बंग्ला ऐ 
  हूँ जाणु वेवण ने बारे हांड ऐ 
*वेवण भराई जाए 
  इलाज ने कराऊ 
    मेहंदी को लेकर वागड़ की युवतियों में ही नहीं युवाओ में भी बहुत क्रेज है प्रत्येक त्यौहार में लगाई जाती है शादी -ब्याह तो बड़ी बात है कोई छोटा सा उत्सव हो , ख़ुशी हो तो भी लगाते है इसपर गीत भी है जो जो फागण में गाये जाते है -
*मेंदी वारी बांगोद में 
  उगी कारा खेता में 
  मेंदी रो रकवारियो सोर 
  कादा में जीव में लू ऐ
कई गीतों में क्षेत्रीयता , गांव की पहचान आदि भी शामिल हो जाती है जो लोगो का जीवन, रहन-सहन बताती है ,रोजगार से जोड़ती है -
 * अहमदाबाद रयो न रयो 
    आवु ने आवु जुवे 
    ने आवे तो घंटा खाली और पटाऊ 
* परतापगढ़ नो जालरियो 
   सोरी नरवाली सिवडायो ऐ 
*तणते सोरा में ईमानदार जानियो 
आके नरवारी न सोरी ते वगाडी ऐ 
    युवक - युवतियों के प्रेम को शब्दों को ,गीतों के माध्यम से व्यक्त करने का फागड अच्छा अवसर है -
*जानु वारु बईरु चप्पल हेती ठेगी पड़ी 
  ठेगे -ठेगे  मसालों बनावी दियू ऐ हारे 
  गुजरात रियो थारी -मारी करि रियो 
  थारी ही न मारी ... दुसरो ऐ 
*मारे तकी टआले किया मत करे सोरी 
  अबार धूरा भेगी वेई जाए 
*जदी कोल आले 
  जदी आंबे - महुड़े कॉल आले 
  आम्बो ऐ वेरियो हाडो 
   डम्पर आवे ऐ 
* जदी कोल आले 
   जदी किसडा में कोल आवे 
   अमरे तो गदाडो वे जाए 
   तोए धोवडु 
*उबी ने उबी रसिया मारे 
  मारु मन झमके बदल रह्यु ऐ 
*होरी रमिया, भेगा -भेगा रमिया 
घेरे जाई ने केवा वारु राको मती 
*जानू वारु बईरु नातरे बरावयु ऐ 
  जानू वारे ढोलिए फेर मजो ली दो ऐ हारे  
   वागड़ी गीत दो स्वर में गाये जाते है इसलिए हर कोई, छोटा -बड़ा इसको सरलता से गा लेता है इसीलिए यहाँ पर हर गांव - गली में होली पर ये गीत गूंजते है। 
- भारत दोसी 9799467007



   

Monday, February 12, 2018

laghukatha - bechari samanata

लघुकथा - बेचारी समानता

        एक घंटे की यात्रा के बाद डॉ त्रिवेदी अपनी पत्नी के साथ वाटिका पहुचे ही थे की पत्नी बोली " वापस चलो घर "
"क्यों ?"
" चलो तो सही "
"पर क्यों ?"
"चलते हो के नहीं ?" पत्नी ने क्रोध से कहा
वे दोनों फिर से घर को चल दिए।  फिर एक घंटे का  सफर   किया।  पत्नी ने साड़ी बदली और बोली " चलो वापस वाटिका चलते है। "
        अब फिर....... डॉ त्रिवेदी ने खीज कर मन में कहा सिर्फ साड़ी बदलने घर आई थी क्या ? ये औरते भी बस....... .
   वे फिर घंटे का सफर कर वाटिका पहुंचे।  भोजन किया।  वापस आने लगे तो डॉ त्रिवेदी ने देखा उनकी गली की सफाई कर्मी भी वैसी ही साड़ी  पहने है जैसी पत्नी ने पहले पहनी थी।  उनको पत्नी की समझदारी पर गर्व हुआ।  उन्होंने मुँह बना कर कहा " ये जातीया भी हमारी बराबरी कर  रही है।  पत्नी ने उदास हो कर सहमति व्यक्त की।
-भारत दोसी 9799467007 

Saturday, February 10, 2018

lekh- mautana :tvrit nyay vyavstha

मौताणा : एक त्वरित  न्याय व्यवस्था

      बांसवाड़ा-डूंगरपुर में आये दिन मौताणा के मामले हो रहे है लाश घर में रख देते है और लाखो रु लेकर मामला निपटता है ये त्वरित न्याय व्यवस्था है  घायल और मृत के परिजन को तुरंत हर्जाना मिल जाता है।  उसके परिवार को आर्थिक सम्बल मिल जाता है।  अगर ये लोग अदालत में जाये तो वहा दर्ज, चल रहे करोड़ो केस में ये भी एक हो जाये ऐसे में मौताणा तुरंत मदद हो जाता है।  प्राचीन काल से प्रचलित यह व्यवस्था अब बहुत लोकप्रिय हो  गई है इस क्षेत्र में रोजाना ऐसा हो रहा है। 
 
     इसको ऐसे भी समझ सकते है की किसीकी  दुर्घटना में मोत हो या अंग भंग हो तो  दुर्घटना करने वाले से आर्धिक मदद दिलवाते है जिसे मौताणा कहते है   और खास बात ये है की इसके ज्यादातर न्याय में पुलिस शामिल रहती है वो प्रत्यक्ष तो मूक दर्शक रहती है लेकिन पूरा मामला उसके संरषण में होता है और हरजाने का १०-२० फीसदी ले लेते है।
      वही न्यायकर्ता जिनको भांजगड़िया कहते है वे असल में पांच होते है वे भी 20 -30 फीसदी लेते है शेष रकम मृतक के परिजन को देते है। 
  केस 1 . ईट भट्टे में काम करने वाले  एक युवक  ने शाम को घर फोन किया की काम ज्यादा है वो सुबह आएगा पर सुबह उसकी लाश आई  जिसकी पीठ पर घाव था    तो उसके मालिक के घर  शव रख दिया गया लाख रु मौताणा लिया गया। 
केस 2 . लड़का प्रेम में लड़की को ले भागा।  भाजगडा हुआ 3 लाख रु लड़की के पिता को देना था लड़के को पर नहीं दिया तो लड़के के घर को आग के हवाले कर दिया गया। 
केस 3 . युवक बाइक से घर आ रहा था टकरा गया और मर गया पता चला की घर को निकले से पहले कुछ युवको से उसका झगड़ा हुआ था तो भाजगडा हुआ और युवक के परिजन को हर्जाना दिलवाया गया।
केस 4 . एक कार किराये पर लेकर आदिवासी शहर आ रहे थे कार दुर्घटना  ग्रस्त हो गई २ मर गए तो कार मालिक से लाखो रु हर्जाना लिया गया। 
    ऐसा भी नहीं है की हर मामले में  भाजगडा सही होता है कई बार अन्याय भी होता है।  गरीब आदमी पीस जाता है कुछ भी नहीं दे पाता है तब संविधान को याद किया जाता है।  संविधान को चाहिए की तेजी से मिलने वाली न्याय व्यवस्था दे और उससे ज्यादा हर्जाना , मुआवजा दे। 
- भारत दोसी 9799467007