मौताणा : एक त्वरित न्याय व्यवस्था
बांसवाड़ा-डूंगरपुर में आये दिन मौताणा के मामले हो रहे है लाश घर में रख देते है और लाखो रु लेकर मामला निपटता है ये त्वरित न्याय व्यवस्था है घायल और मृत के परिजन को तुरंत हर्जाना मिल जाता है। उसके परिवार को आर्थिक सम्बल मिल जाता है। अगर ये लोग अदालत में जाये तो वहा दर्ज, चल रहे करोड़ो केस में ये भी एक हो जाये ऐसे में मौताणा तुरंत मदद हो जाता है। प्राचीन काल से प्रचलित यह व्यवस्था अब बहुत लोकप्रिय हो गई है इस क्षेत्र में रोजाना ऐसा हो रहा है।
इसको ऐसे भी समझ सकते है की किसीकी दुर्घटना में मोत हो या अंग भंग हो तो दुर्घटना करने वाले से आर्धिक मदद दिलवाते है जिसे मौताणा कहते है और खास बात ये है की इसके ज्यादातर न्याय में पुलिस शामिल रहती है वो प्रत्यक्ष तो मूक दर्शक रहती है लेकिन पूरा मामला उसके संरषण में होता है और हरजाने का १०-२० फीसदी ले लेते है।
वही न्यायकर्ता जिनको भांजगड़िया कहते है वे असल में पांच होते है वे भी 20 -30 फीसदी लेते है शेष रकम मृतक के परिजन को देते है।
केस 1 . ईट भट्टे में काम करने वाले एक युवक ने शाम को घर फोन किया की काम ज्यादा है वो सुबह आएगा पर सुबह उसकी लाश आई जिसकी पीठ पर घाव था तो उसके मालिक के घर शव रख दिया गया लाख रु मौताणा लिया गया।
केस 2 . लड़का प्रेम में लड़की को ले भागा। भाजगडा हुआ 3 लाख रु लड़की के पिता को देना था लड़के को पर नहीं दिया तो लड़के के घर को आग के हवाले कर दिया गया।
केस 3 . युवक बाइक से घर आ रहा था टकरा गया और मर गया पता चला की घर को निकले से पहले कुछ युवको से उसका झगड़ा हुआ था तो भाजगडा हुआ और युवक के परिजन को हर्जाना दिलवाया गया।
केस 4 . एक कार किराये पर लेकर आदिवासी शहर आ रहे थे कार दुर्घटना ग्रस्त हो गई २ मर गए तो कार मालिक से लाखो रु हर्जाना लिया गया।
ऐसा भी नहीं है की हर मामले में भाजगडा सही होता है कई बार अन्याय भी होता है। गरीब आदमी पीस जाता है कुछ भी नहीं दे पाता है तब संविधान को याद किया जाता है। संविधान को चाहिए की तेजी से मिलने वाली न्याय व्यवस्था दे और उससे ज्यादा हर्जाना , मुआवजा दे।
- भारत दोसी 9799467007
बांसवाड़ा-डूंगरपुर में आये दिन मौताणा के मामले हो रहे है लाश घर में रख देते है और लाखो रु लेकर मामला निपटता है ये त्वरित न्याय व्यवस्था है घायल और मृत के परिजन को तुरंत हर्जाना मिल जाता है। उसके परिवार को आर्थिक सम्बल मिल जाता है। अगर ये लोग अदालत में जाये तो वहा दर्ज, चल रहे करोड़ो केस में ये भी एक हो जाये ऐसे में मौताणा तुरंत मदद हो जाता है। प्राचीन काल से प्रचलित यह व्यवस्था अब बहुत लोकप्रिय हो गई है इस क्षेत्र में रोजाना ऐसा हो रहा है।
इसको ऐसे भी समझ सकते है की किसीकी दुर्घटना में मोत हो या अंग भंग हो तो दुर्घटना करने वाले से आर्धिक मदद दिलवाते है जिसे मौताणा कहते है और खास बात ये है की इसके ज्यादातर न्याय में पुलिस शामिल रहती है वो प्रत्यक्ष तो मूक दर्शक रहती है लेकिन पूरा मामला उसके संरषण में होता है और हरजाने का १०-२० फीसदी ले लेते है।
वही न्यायकर्ता जिनको भांजगड़िया कहते है वे असल में पांच होते है वे भी 20 -30 फीसदी लेते है शेष रकम मृतक के परिजन को देते है।
केस 1 . ईट भट्टे में काम करने वाले एक युवक ने शाम को घर फोन किया की काम ज्यादा है वो सुबह आएगा पर सुबह उसकी लाश आई जिसकी पीठ पर घाव था तो उसके मालिक के घर शव रख दिया गया लाख रु मौताणा लिया गया।
केस 2 . लड़का प्रेम में लड़की को ले भागा। भाजगडा हुआ 3 लाख रु लड़की के पिता को देना था लड़के को पर नहीं दिया तो लड़के के घर को आग के हवाले कर दिया गया।
केस 3 . युवक बाइक से घर आ रहा था टकरा गया और मर गया पता चला की घर को निकले से पहले कुछ युवको से उसका झगड़ा हुआ था तो भाजगडा हुआ और युवक के परिजन को हर्जाना दिलवाया गया।
केस 4 . एक कार किराये पर लेकर आदिवासी शहर आ रहे थे कार दुर्घटना ग्रस्त हो गई २ मर गए तो कार मालिक से लाखो रु हर्जाना लिया गया।
ऐसा भी नहीं है की हर मामले में भाजगडा सही होता है कई बार अन्याय भी होता है। गरीब आदमी पीस जाता है कुछ भी नहीं दे पाता है तब संविधान को याद किया जाता है। संविधान को चाहिए की तेजी से मिलने वाली न्याय व्यवस्था दे और उससे ज्यादा हर्जाना , मुआवजा दे।
- भारत दोसी 9799467007
अलग विचार
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