Tuesday, April 29, 2025

राजेंद्र सजल के उपन्यास निर्वासित मेरे विचार


जो सदियों से बहिष्कृत है वे अब भी है

 

     जाति हमारी नसों में है. एक जाति ने दूसरी जाति को अपने से ऊपर – नीचे कर रखा है हाँ , आपने सही पढ़ा की कुछ जातियों ने स्वयमं अपने ऊपर कुछ जातियों को मान लिया है और उसी के अनुसार व्यवहार किया जाता है.

     अगर उपनाम से जाति का पता नहीं लगता है तो बैचेनी होती है कैसे व्यवहार करे इसका असमंजस रहता है. जी हा , सामने वाला किसी भी पद, प्रतिष्ठा का हो या पैसे वाला हो उसके साथ व्यवहार का फैसला तो जाति ही करती है.

    आश्चर्यजनक तो यह है की जिन जातियों ने अछूत बनाया वे  जातियां  भी आपस में ऊंच-नीच खोज बैठी है या उनको ऐसा बनाया गया है और वे भी रोटी-बेटी का व्यवहार नहीं कर रही है.

    राजेन्द्र सजल के उपन्यास निर्वासित में दो कथित अछूत जाति के मुख्य पात्र रोज और सूरी प्रेम करते है शादी का दोनों की जाति, परिवार बहिष्कार करते है सूरी के माता-पिता तो और भी सहमत होते है क्योकि वे प्रगतिशील है लेकिन रोज के परिवार वाले “ मर गया “ मान लेते है.

    उपन्यासकार ने लिखा है “ जाति व्यवस्था सामाजिक व्यवस्था न होकर राजनैतिक व्यवस्था है” एक और  स्थान पर लिखा है “ सामाजिक सत्ता का विकसित रूप ही राजनैतिक सत्ता है और सामाजिक सत्ता उन लोगो के हाथ में है जो यह मानते है की हम जन्म से श्रेष्ठ है.” यह बात सही भी है राजनैतिक स्वार्थ के कारण ही सत्ता के निकट रही जाति ने समाज को ऐसा बनाया है जिससे उनके स्वार्थ पूरे हो रहे है.

    जब दोनों मुख्य पात्र भारी संघर्ष के पश्चात यूपीएससी क्लियर कर लेते है तब रोज के परिवार की मनोदशा  बदल जाती है क्योकि वो सत्ता में आ गया है. उपन्यास यही खत्म हो जाता है दोनों प्रशासक बनकर व्यवस्था के अंग बनते है सिस्टम के हिस्सा बनते है या अपनी जाति के लिए डॉ आंबेडकर के सपने के अनुरूप काम करते है इसपर अनकहा है.  सूरी की जाति पर भी इसका क्या असर है इसपर उपन्यासकार चुप है.

     उपन्यासकार ने विषय वस्तु को अच्छे शब्दों में बाँधा है. दुसरे पात्र भी सफलतापूर्वक गड़े गये है. अनावश्यक खींचे नहीं गए है. आजादी के 75 वर्ष बाद भी जब कहा जाता है की “भंगी की बेटी झाड़ू नहीं तो क्या तलवार उठाएगी ?” तब लगता है की परिवर्तन की चक्की बहुत-बहुत धीरे चल रही है. जब रोज कहता है की “ फिर भी एक अछूत दुसरे को अछूत मानता है जब तुम्हारा समाज मेरे समाज की रोटी स्वीकार नहीं कर सकता तो बेटी कैसे स्वीकार करेगा ?” तब लगता है की जिस किसी ने यह व्यवस्था बने है वह बहुत कमजोर था मानवीय द्रष्टि से कंगाल था जिसका फल हम लम्बे समय तक भुगतेंगे.

    आज जो  ऊपरी तौर  पर बदला वातावरण दिखाई देता है उसपर उपन्यासकार ने व्यंग किया है “ बेटा, दलित- महादलित आज कल हिन्दू ही नहीं है धरम रक्षक भी बन कर उभर रहे है.” यह वाक्य आज को बता रहा है अतीत को नहीं.बाबा साहब के संविधान ने नौकरी दिला दी है लेकिन समानता नहीं.

     उपन्यासकार ने रोज के माध्यम से लिखा है “ यही तो दलितों के शोषण का कारण है ये लोग आपस में ही एक दुसरे से इतनी हो नफरत करते है जितनी वर्णवादी करते है फिर कहते है की हम दलित है.” उपन्यास की कथावस्तु सामाजिक होने के साथ ही आंचलिक भी है.जयपुर और आस पास के परिवेश को बाँधा गया है. शैली अन्तरद्वन्द के साथ ही कही -कही  वर्णात्मक भी है. सामाजिक मुद्दे को उठाया गया है. अगर उद्देश्य देखे तो समाज की आलोचनात्मक व्याख्या की गई है. उपन्यास बहुत पढ़ा जायेगा ऐसी उम्मीद है.

भारत दोसी

गाँधी सद्भावना पुरुस्कार से सम्मानित

9799467007    


Friday, April 18, 2025

समीक्षा




जूठन

 

कुछ पुस्तकें पढ़ते है तो मन-मस्तिष्क झकझोर जाता है सामाजिक व्यवस्था पर आक्रोश होता है ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा को पढ़ते हुए लगा की बहुसंख्यक वर्ग ने जातिवाद का दंश कैसे सहा होगा ?

     वाल्मीकि अपनी पत्नी के साथ रेल में सफ़र कर रहे थे कुछ ही देर में साथ बैठे दम्पति से बातचीत शुरू हो गई. कमांडर स्तर के अफसर से सहज,सरल, आत्मीय बातचीत चल रही थी हंसी मजाक भी हो रही थी  अचानक कमांडर ने पूछा आपकी जाति क्या है ? वाल्मीकि ने कहा भंगी सन्नाटा छा गया जो रेल से उतरे तब तक बना रहा.

  पूरे जीवन में ऐसा अनेकानेक बार अनुभव करने वाले वाल्मीकि ने अपनी आत्मकथा “जूठन” में अपने जीवन की पीडाएं व्यक्त की है वे लिखते है “ एक ऐसी समाँज व्यवस्था में हमने साँसे ली जो बेहद क्रूर और अमानवीय है दलितों के प्रति असंवेदनशील  भी... “

   चूहड़ समाज में जन्में वाल्मीकि के शिक्षा अनुभव डॉ भीमराव आंबेडकर से मिलते जुलते है जो की पच्चास वर्ष के अंतर के बाद के है और वाल्मीकि के तो आजादी के बाद के है स्कूल के शिक्षक उनसे झाड़ू लगवाते थे अलग बैठाते थे और कहते थे “ चूहड़ पढ़कर क्या करेगा?” परन्तु अपने पिताजी की जिजीविषा “ पढ़-लिखकर जाति सुधारनी है” को मूलमंत्र बनाकर आगे बढे लेकिन जाति कभी गई ही नहीं. बारहवी पास की तब लोग कहते थे “अबे, सौहरे {ससुरे} यहाँ तक पहुच गिया”

     इस आत्मकथा में आंसू है,दर्द है,व्यथा है,शब्द कम है भाव ज्यादा है. वे जब अपने वस्त्र इस्त्री करवाने धोबी के पास जाते है तब धोबी कहता है “ हम चूहड़-चमारों के कपड़े नहीं धोते, न ही इस्त्री करते है,जो तेरे कपड़े पे इस्त्री कर देंगे तो तगा { त्यागी } हमसे कपड़े न धुलवायेंगे म्हारी तो रोजी रोटी चली जागी...”

    ऐसा नहीं है की सभी अध्यापक बुरे ही मिले कुछ मानवीय भी मिले जिससे वाल्मीकि आर्डिनेंस फैकट्री में नौकरी तक पहुचे उन्होंने इस आत्मकथा में लिखा है “ फैक देने वाली चीज हमारी भूख मिटाने वाली थी.”

     वाल्मीकि की कविता “ ठाकुर का कुआ “ बहुत चर्चित है दरोगा द्वरा बेगार के लिए मना करने पर चूह्ड़ो की पिटाई के बाद पैदा हुई वितृष्ना और सुमित्रानंद पन्त की कविता आह ग्राम्य जीवन भी क्या... के बाद उद्देलित होकर लिखी थी. उन्होंने लिखा है “ लेकिन मन में एक उबाल सा उठता था जो कहना चाहता था में हिन्दू भी तो नहीं हूँ यदि हिन्दू होता तो हिन्दू मुझसे इतनी नफरत, इतना भेदभाव क्यों करते? बात बात पर जातीय बोध की हीनता से मुझे क्यों भरते ?”

    आत्मकथा में भोपाई, सलाम प्रथा, सूअर  के बच्चे की बलि, दसवी की परीक्षा के गणित पेपर के पहले दिन बैगार, मरे जानवर का चमडा उतारने आदि पर स्पष्टता से लिखा है तभी उन्होंने लिखा है “ पढ़ लिखकर जातीय नहीं सुधरती वे सुधरती है जन्म से.”

    महाराष्ट्र में सातवी कक्षा की मराठी पुस्तक में डॉ आंबेडकर पर एक पाठ था शिक्षक ने वह पाठ ही छात्रों से फड़वा दिया बड़ा आन्दोलन हुआ पर शिक्षक पर कोई कार्यवाही नहीं हुई. ऐसी अनेक घटनाओ का इस आत्मकथा में विस्तार से जिक्र है.

   उन्होंने साहित्य से जुड़े अपने अनुभव में लिखा है उनकी एक कहानी सारिका पत्रिका ने स्वीक्रती के  पश्चात् भी दस वर्ष तक प्रकाशित  नहीं की “ साहित्य के भीतर भी एक सत्ता है जो अंकुरित होते पौधे को कुचल देती है .”

      अपने नाम ओमप्रकाश के साथ वाल्मीकि लगाने को लेकर बहुत लेखन है इसके कारण उठे भ्रम को भी लिखा है वही परिवार के द्वरा हटाने के दबाव पर भी. उनकी स्वय की भतीजी उनसे इसलिए नहीं जुडती की वाल्मीकि जानकर वह समाज को कैसे फेस करेगी? उनके सरनेम से उनकी पहचान खुल जाती थी परन्तु स्वयं उन्होंने कभी छिपाया नहीं उन्होंने लिखा है “ इस पीड़ा का एहसास उन्हें कैसे होगा जिन्होंने नफरत और द्वेष की बारीक़ सुइयों का दर्द अपनी त्वचा पर कभी महसूस नहीं किया ? अपमान जिन्हें भोगने नहीं पड़े? वे अपमान बोध को कैसे जान पाएँगे?”

        दलित के दर्द को समझने के लिए यह एक बेहतरीन आत्मकथा है जो बचपन से लेकर अंतिम समय तक को व्यक्त करती है हर सन्वेदनशील पाठक को इसको पढना चाहिए.

भारत दोसी

गाँधी सद्भावना पुरुस्कार से सम्मानित

9799467007 

Friday, April 4, 2025

तपस्या ना भूलने लायक उपन्यास

तपस्या
नहीं भूलने लायक उपन्यास
विश्वनाथ तवर का उपन्यास "तपस्या " पढ़ते हुए अनेक बार मुझे अपना कॉलेज जीवन याद आया स्मृति मैं उस उम्र की चकलस उभर गई 1970- 80 की पृष्ठभूमि में  लिखे इस उपन्यास में पात्र रामप्रकाश और वैदेही को पढ़ते हुए लगता है कि टाइम मशीन बहुत पीछे ले गई है और सब कुछ हमारे समक्ष घटित हो रहा है.
    मध्यम वर्ग के परिवारों की उसे कालखंड में आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी लेकिन परिवार में खुलापन था प्रगतिशीलता थी. शिक्षक प्रशिक्षण कोर्स पूर्ण होने के पश्चात प्रेमी- प्रेमिका रामप्रकाश और वैदेही अपने-अपने परिवार में होते हैं .प्रेमिका बहुत ज्यादा बेचैन रहती है समय का चक्र ऐसा घूमता है की तलाकशुदा से ब्याह की बात होती है उसे समय यह बड़ी बात थी. उपन्यास में पात्रों का चयन और उनके मध्य संवाद को बहुत कुशलतापूर्वक लिखा गया है जो कई बार लंबे-लंबे लेकिन जिज्ञासा बनाए रखते हैं.
    शिप्रा ,माधुरी ,माधवी ,विमल आदि पात्रों को घटनाक्रम से धारा प्रवाह जोड़ दिया गया है लेखन की शैली ऐसी है कि पूर्व के पड़े  अनेक उपन्यास याद आते हैं अनेक बार आंखें नम हो जाती है अच्छे लोगों के साथ बुरा होता पढ़कर  समाज व्यवस्था बंधन व्यर्थ लगते हैं वैदेही जब कहती "मैं आपको भूलना ही भूल गई थी" तब रिश्तो का महत्व समझ में आता है
भारत दोषी
गांधी सद्भावना सम्मान प्राप्त लेखक

Thursday, April 3, 2025

राम का अपहरण कहानी संग्रह डॉ राशि सिंहा

राम का अपहरण
पांच कहानियों का संग्रह
      डॉक्टर राशि सिंह का कहानी संग्रह 'राम का अपहरण' समसामयिक, प्रासंगिक है इसकी कहानी वर्तमान का सच प्रस्तुत करती है 'सच्ची उड़ान' की एनी को उसकी मासी मनोवैज्ञानिक तरीके से रास्ते पर लाती है आज की युवाओं मैं चल रही समस्या का हल है इस कहानी मे. युवा स्वतंत्रता को स्वच्छंदता समझ बैठे हैं और पुरानी पीढ़ी उसको सही रास्ते पर नहीं ला पा रही है पर इस कहानी में ले आती है .
'हामी' कहानी की महिला पात्र आर्थिक रूप से सक्षम होते ही पुरुष की तरह व्यवहार करने लगती है स्त्री विमर्श की यह कहानी ललिता देवी के पात्र के रूप में स्वाभिमानी है .
इस संग्रह की बेहतरीन कहानी 'इंपोर्टेंस' है इसमें स्त्री खुलापन लिए है  और उसका पति अपवाद उसकी समझ चालाकी लगती है पुरुष स्त्री को गलत समझता है उसके सहज  ,सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार को शारीरिक समर्पण मान लेता है .
कहानी संग्रह में सिर्फ पांच कहानियां लेकिन पांचो अलग-अलग रंग लिए हुए 'श्रॉप का डांस' कहानी में पुरुष पात्र कर्म में व्यस्त थे अपनी पत्नी को समय नहीं देता और एक घटना पत्नी को श्रापित बना देती है  श्रॉप कैसे लागू होता है यह पता नहीं है यह मनोवैज्ञानिक दबाव भी हो सकता है .
   बिहार की बड़ी समस्या पकडूआ ब्याह पर लिखी कहानी तो अद्भुत है "राम का अपहरण" नाम कुछ विवाद पैदा करता है पात्रों की तुलना भी राम सीता से है लेकिन सकारात्मक है रूबी जैसा पात्र सुकून भरा है एक बार पढ़ने लायक है  कहानी संग्रह.
   कहानीया काल्पनिक होने के साथ-साथ यथार्थ भी लीए हुए हैं विषय वस्तु बहुत अच्छी है और पात्रों का चयन भी श्रेष्ठ है अनावश्यक रूप से कहानियों को खींचा नहीं गया है शैली कुशलता पूर्ण है.
भारत दोषी
गांधी सद्भावना सम्मान प्राप्त लेखक
97994 67007