Friday, April 18, 2025

समीक्षा




जूठन

 

कुछ पुस्तकें पढ़ते है तो मन-मस्तिष्क झकझोर जाता है सामाजिक व्यवस्था पर आक्रोश होता है ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा को पढ़ते हुए लगा की बहुसंख्यक वर्ग ने जातिवाद का दंश कैसे सहा होगा ?

     वाल्मीकि अपनी पत्नी के साथ रेल में सफ़र कर रहे थे कुछ ही देर में साथ बैठे दम्पति से बातचीत शुरू हो गई. कमांडर स्तर के अफसर से सहज,सरल, आत्मीय बातचीत चल रही थी हंसी मजाक भी हो रही थी  अचानक कमांडर ने पूछा आपकी जाति क्या है ? वाल्मीकि ने कहा भंगी सन्नाटा छा गया जो रेल से उतरे तब तक बना रहा.

  पूरे जीवन में ऐसा अनेकानेक बार अनुभव करने वाले वाल्मीकि ने अपनी आत्मकथा “जूठन” में अपने जीवन की पीडाएं व्यक्त की है वे लिखते है “ एक ऐसी समाँज व्यवस्था में हमने साँसे ली जो बेहद क्रूर और अमानवीय है दलितों के प्रति असंवेदनशील  भी... “

   चूहड़ समाज में जन्में वाल्मीकि के शिक्षा अनुभव डॉ भीमराव आंबेडकर से मिलते जुलते है जो की पच्चास वर्ष के अंतर के बाद के है और वाल्मीकि के तो आजादी के बाद के है स्कूल के शिक्षक उनसे झाड़ू लगवाते थे अलग बैठाते थे और कहते थे “ चूहड़ पढ़कर क्या करेगा?” परन्तु अपने पिताजी की जिजीविषा “ पढ़-लिखकर जाति सुधारनी है” को मूलमंत्र बनाकर आगे बढे लेकिन जाति कभी गई ही नहीं. बारहवी पास की तब लोग कहते थे “अबे, सौहरे {ससुरे} यहाँ तक पहुच गिया”

     इस आत्मकथा में आंसू है,दर्द है,व्यथा है,शब्द कम है भाव ज्यादा है. वे जब अपने वस्त्र इस्त्री करवाने धोबी के पास जाते है तब धोबी कहता है “ हम चूहड़-चमारों के कपड़े नहीं धोते, न ही इस्त्री करते है,जो तेरे कपड़े पे इस्त्री कर देंगे तो तगा { त्यागी } हमसे कपड़े न धुलवायेंगे म्हारी तो रोजी रोटी चली जागी...”

    ऐसा नहीं है की सभी अध्यापक बुरे ही मिले कुछ मानवीय भी मिले जिससे वाल्मीकि आर्डिनेंस फैकट्री में नौकरी तक पहुचे उन्होंने इस आत्मकथा में लिखा है “ फैक देने वाली चीज हमारी भूख मिटाने वाली थी.”

     वाल्मीकि की कविता “ ठाकुर का कुआ “ बहुत चर्चित है दरोगा द्वरा बेगार के लिए मना करने पर चूह्ड़ो की पिटाई के बाद पैदा हुई वितृष्ना और सुमित्रानंद पन्त की कविता आह ग्राम्य जीवन भी क्या... के बाद उद्देलित होकर लिखी थी. उन्होंने लिखा है “ लेकिन मन में एक उबाल सा उठता था जो कहना चाहता था में हिन्दू भी तो नहीं हूँ यदि हिन्दू होता तो हिन्दू मुझसे इतनी नफरत, इतना भेदभाव क्यों करते? बात बात पर जातीय बोध की हीनता से मुझे क्यों भरते ?”

    आत्मकथा में भोपाई, सलाम प्रथा, सूअर  के बच्चे की बलि, दसवी की परीक्षा के गणित पेपर के पहले दिन बैगार, मरे जानवर का चमडा उतारने आदि पर स्पष्टता से लिखा है तभी उन्होंने लिखा है “ पढ़ लिखकर जातीय नहीं सुधरती वे सुधरती है जन्म से.”

    महाराष्ट्र में सातवी कक्षा की मराठी पुस्तक में डॉ आंबेडकर पर एक पाठ था शिक्षक ने वह पाठ ही छात्रों से फड़वा दिया बड़ा आन्दोलन हुआ पर शिक्षक पर कोई कार्यवाही नहीं हुई. ऐसी अनेक घटनाओ का इस आत्मकथा में विस्तार से जिक्र है.

   उन्होंने साहित्य से जुड़े अपने अनुभव में लिखा है उनकी एक कहानी सारिका पत्रिका ने स्वीक्रती के  पश्चात् भी दस वर्ष तक प्रकाशित  नहीं की “ साहित्य के भीतर भी एक सत्ता है जो अंकुरित होते पौधे को कुचल देती है .”

      अपने नाम ओमप्रकाश के साथ वाल्मीकि लगाने को लेकर बहुत लेखन है इसके कारण उठे भ्रम को भी लिखा है वही परिवार के द्वरा हटाने के दबाव पर भी. उनकी स्वय की भतीजी उनसे इसलिए नहीं जुडती की वाल्मीकि जानकर वह समाज को कैसे फेस करेगी? उनके सरनेम से उनकी पहचान खुल जाती थी परन्तु स्वयं उन्होंने कभी छिपाया नहीं उन्होंने लिखा है “ इस पीड़ा का एहसास उन्हें कैसे होगा जिन्होंने नफरत और द्वेष की बारीक़ सुइयों का दर्द अपनी त्वचा पर कभी महसूस नहीं किया ? अपमान जिन्हें भोगने नहीं पड़े? वे अपमान बोध को कैसे जान पाएँगे?”

        दलित के दर्द को समझने के लिए यह एक बेहतरीन आत्मकथा है जो बचपन से लेकर अंतिम समय तक को व्यक्त करती है हर सन्वेदनशील पाठक को इसको पढना चाहिए.

भारत दोसी

गाँधी सद्भावना पुरुस्कार से सम्मानित

9799467007 

No comments:

Post a Comment