Tuesday, November 10, 2015

kavita- likho kuchh eisa....

 हाथ में
लेखनी है
फिर भी डर रहे   हो
मौन
धारण किये
सब सह रहे हो
खुद से
खुद की व्यथा
नहीं कह रहे हो

उठो
लिखो  जो  लिखना चाहते हो
उगाओ
लाल सूरज  जो उगाना  चाहते हो
हंसिए से काट दो
जो कांटना चाहते हो
घन से तोड़ दो
 तोडना चाहते हो
लिखो कुछ ऐसा
जो लिखना चाहते हो।   

Monday, November 2, 2015

SHER

१. करता हूँ बुराई किसी की भी  नहीं
    है हमारा पीएम पर अच्छा भी नहीं

2. ये करूँगा वो करूँगा कहते थकता नहीं
    कुछ करता हो ऐसा लगता भी नहीं

3 आज वही बुलेंदी पे नजर आ रहा है
  धर्म के नाम पर जो लोगो को लड़ा रहा है

4 सिर्फ सुनते थे मगर आज ये देखा भी
   राजनीति से लोगो के जज्बात बदल जाते है

5. अमावस्या सा छा गया वो देश में
    एक  टुकड़े रौशनी तरसा गया वो देश में
6. तुम चाहो तब मैं जुबा खोलू
    इससे अच्छा है जीभ शहीद करलू