फिर भी तुम्हारा स्वागत है००००
प्रिय ,
उम्मीद है तुम दिल से स्वस्थ होगी क्योंकि तुमने जो किया वह दिमाग से किया लगता है पर मेरा दिल और दिमाग दोनों छला हुआ है। मैं ठगा हुआ महसूस कर रहा हूँ।
मेरी जानकारी ,याददाश्त में मैने तुम्हारे साथ कभी बुरा नहीं किया। शब्दों से भी तुम्हारा दिल नहीं दुखाया अपना पुराण प्यार ,स्नेह , सम्मान ,बराबरी तुमको दी।
जब भी तुम मेरे साथ बैठी विशेष रूप से बाइक पर तभी तुम्हे मैंने उसके मिरर में देखा। सीधे तो झलक ही देखी और मिरर में भी तुम्हारी आँखे ही देखि क्योकि मुँह स्टाल से हमेश बंधा ही रहता था। तुमसे मैंने कभी कुछ नहीं चाहा और तुमने कभी कुछ देने को नहीं कहा।
तुम्हारे साथ से सफर सुहाना था। दिनभर के तनवसे, थकन से मुक्ति थी ,हंसी- मजाक थी. पता नहीं क्या जादू था तुम्हारे साथ में की हर दुःख से दूर हो जाता था। जीवन सरल होकर निर्मल, निराल प्रवह में बाह रहा था।
लेकिन यह सब मेरी तरफ से ही था तुम्हारी तरफ से तो सब कुछ सोचा समझा था। तुम्हारे लिए मैं एक साधन मात्र था और जैसे ही तुम्हें मेरा विकल्प मिला तुमने मुझे मक्खी की तरह निकालकर फैंक दिया। तुमने तो कहा भी था की तुम यूज़ एंड थ्रो में विश्वास करती हो तुमने तो मुझे ठोकर भी मारी थी। गलती तो मेरी है जो मई तुम्हे समझते हुए भी न समझ बना रहा। मैं दीवानगी में दिमाग को भूल गया बस दिल से तुम्हारे बारे में सोचता रहा।
सच कहुँ तुम मेरे जीवन में वापस आओगी तो मैं तुम्हें इतना जलील होने के बाद भी ठुकरा नहीं सकूंगा कोई प्रश्न नहीं कर सकूँगा पूछ नहीं सकूँगा की तुमने मेरे साथ ऐसा क्यों किया। शायद मेरी प्रकृति ही प्रेम है, स्नेह है, सम्मान है.... .
मैं जनता हूँ जीवन मई आगे भी इसी तरह से ठगा जाऊंगा पर मै तैयार हूँ यही प्यार है और तुम्हारे जीवन में इससे दूर -दूर तक कोई लेना -देना नहीं है।
फिर भी मैं भी अपने जीवन में तुम्हारा सम्मान करुगा .... प्रतीक्षा में....
सिर्फ तुम्हारा
प्रिय ,
उम्मीद है तुम दिल से स्वस्थ होगी क्योंकि तुमने जो किया वह दिमाग से किया लगता है पर मेरा दिल और दिमाग दोनों छला हुआ है। मैं ठगा हुआ महसूस कर रहा हूँ।
मेरी जानकारी ,याददाश्त में मैने तुम्हारे साथ कभी बुरा नहीं किया। शब्दों से भी तुम्हारा दिल नहीं दुखाया अपना पुराण प्यार ,स्नेह , सम्मान ,बराबरी तुमको दी।
जब भी तुम मेरे साथ बैठी विशेष रूप से बाइक पर तभी तुम्हे मैंने उसके मिरर में देखा। सीधे तो झलक ही देखी और मिरर में भी तुम्हारी आँखे ही देखि क्योकि मुँह स्टाल से हमेश बंधा ही रहता था। तुमसे मैंने कभी कुछ नहीं चाहा और तुमने कभी कुछ देने को नहीं कहा।
तुम्हारे साथ से सफर सुहाना था। दिनभर के तनवसे, थकन से मुक्ति थी ,हंसी- मजाक थी. पता नहीं क्या जादू था तुम्हारे साथ में की हर दुःख से दूर हो जाता था। जीवन सरल होकर निर्मल, निराल प्रवह में बाह रहा था।
लेकिन यह सब मेरी तरफ से ही था तुम्हारी तरफ से तो सब कुछ सोचा समझा था। तुम्हारे लिए मैं एक साधन मात्र था और जैसे ही तुम्हें मेरा विकल्प मिला तुमने मुझे मक्खी की तरह निकालकर फैंक दिया। तुमने तो कहा भी था की तुम यूज़ एंड थ्रो में विश्वास करती हो तुमने तो मुझे ठोकर भी मारी थी। गलती तो मेरी है जो मई तुम्हे समझते हुए भी न समझ बना रहा। मैं दीवानगी में दिमाग को भूल गया बस दिल से तुम्हारे बारे में सोचता रहा।
सच कहुँ तुम मेरे जीवन में वापस आओगी तो मैं तुम्हें इतना जलील होने के बाद भी ठुकरा नहीं सकूंगा कोई प्रश्न नहीं कर सकूँगा पूछ नहीं सकूँगा की तुमने मेरे साथ ऐसा क्यों किया। शायद मेरी प्रकृति ही प्रेम है, स्नेह है, सम्मान है.... .
मैं जनता हूँ जीवन मई आगे भी इसी तरह से ठगा जाऊंगा पर मै तैयार हूँ यही प्यार है और तुम्हारे जीवन में इससे दूर -दूर तक कोई लेना -देना नहीं है।
फिर भी मैं भी अपने जीवन में तुम्हारा सम्मान करुगा .... प्रतीक्षा में....
सिर्फ तुम्हारा
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