प्रिय ,
मुझे उस दिन ही समझ लेना चाहिए था की तुम मुझसे प्रेम नहीं करती जब तुमने कहा जाओ -जाओ मैं तुम्हारे साथ नहीं आ रही, उसके साथ आ रही हूँ। मैंने मन था की यहाँ अस्थाई है। फिर दूसरे दिन मैंने तुम पर लगे आरोपों या कहे अफवाह की सुनी तो विचलित हो गया। तुम ऐसी नहीं हो फिर तुम पर क्यों आरोप लग्र क्यों तुम्हे बदनाम किया गया ? किसने किया ?कई बाते मेरे दिमाग में आई। दिल ने कहा तुमसे बात करू पर नहीं की जा तुम रास्ते में दिख गई और मेरे रुकने के बाद ,बात करने के आग्रह पर भी रुखाई दिखाई तो मैं क्षुब्द हो गया।
मैं समझ नहीं सका तुमने ऐसा क्यों किया ? वो साथ था पर तुम्हारी क्या मज़बूरी थी क्या रिश्ते इतनी निर्ममता से तोड़े जाते है। खैर मैंने सोच की तुम न समझ हो ,बचपना है, सही-गलत , अच्छा-बुरा नहीं जानती इसलिए ऐसा किया। मैंने अपना मन बहला लिया।
फिर दूसरे दिन मैंने तुमको कॉल किया तुमने कहा " मैं किसी से बात नहीं करती, बैठकर नहीं करना चाहती। हीर भी मैं ने बार-बार आग्रह किया तुम मान गई। मैंने तुम्हे ऊँच -नीच, महिलो की सामाजिक स्थिति ,एक बार बदनामी के बाद मुश्किल जैसी बाटे बताई पर तुमने एक न सुनी वर्ण मुझे छोटा ही कर दिया।
और तो और मेरी कही बाटे उसे बता दी। मैं तो तुम्हारी भलाई चाहता था पर तुमने सोचा मई तुम्हारी जुदाई के दर से यहाँ कह रहा हूँ। अगले दिन फिर हम मिले मैंने फिर कुछ उदाहरण से बताया पर..... .
परन्तु आज कितने ही दिन बाद जब मैंने तुमसे बात नहीं की है तुमसे दूर हूँ देखा भी नहीं है फिर भी भीतर ही भीतर रो रहा हूँ क्यों मैं तुम्हे वह नहीं समझा सका। क्या मई प्यार नहीं सका।
सिर्फ तुम्हारा
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