कविता
दीपक
मैं जब छोटा था
तब से देख रहा हूँ तुमको
दीपावली के कुछ दिन
पहले से माँ जलाती है
रोशन करती है तुमसे सुबह
जैसे कर रही स्वागत सूरज का
शाम को
मीटा रही हो तिमिर को .
दीपावली की शाम को
घर का हर कौना
जगमग जाता है तुमसे
छत की मुंडेर टिमटिमाती है
पंक्तिबद्ध ऐसे,लगते हो तुम जैसे
पढ़ा रहे हो पाठ
अनुशासन का.
माँ कहती है
तुम्हारी रोशनी का कोई विकल्प नहीं
कितनी ही जला लो मोमबत्तियां
या जला दो बल्ब की लड़ियाँ
तुम्हारी रोशनी ही भरती है
भीतरी प्रकाश
मीटाती है अंदर का अंधकार
वो तुम्हे मानती है
जलती हुई, आत्मवान
माँ इसलिए करती है रोज दिया- बाती
नीज मंदिर,तुलसी चौबार
वो जानती है तुम्हारा प्रकाश
करता है घर को सरोबर,पावन,संस्कार.
तुम्हारे होते कैसे
हो सकता है धरती पर अँधियारा ?
तुम खुद जलकर
करते हो प्रकाश
हर घर को रोशन
जिससे होते सब आबाद.
भारत दोसी
9799467007
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