Tuesday, October 22, 2024

कविता

कविता

 

दीपक

 

मैं जब छोटा था

तब से देख रहा हूँ तुमको

दीपावली के कुछ दिन

पहले से माँ जलाती है

रोशन करती है तुमसे सुबह

जैसे कर रही स्वागत सूरज का

शाम को

मीटा रही हो तिमिर को .

 

दीपावली की शाम को

घर का हर  कौना  

जगमग जाता है तुमसे

छत की मुंडेर टिमटिमाती है

पंक्तिबद्ध ऐसे,लगते हो तुम जैसे

पढ़ा रहे हो पाठ

अनुशासन का.

 

माँ कहती है

तुम्हारी रोशनी का कोई विकल्प नहीं

कितनी ही जला लो मोमबत्तियां

या जला दो बल्ब की लड़ियाँ

तुम्हारी रोशनी ही भरती है

भीतरी प्रकाश

मीटाती है अंदर का अंधकार

वो तुम्हे मानती है

जलती हुई, आत्मवान

माँ इसलिए करती है रोज दिया- बाती

नीज मंदिर,तुलसी चौबार

वो जानती है तुम्हारा प्रकाश

करता है घर को सरोबर,पावन,संस्कार.

 

तुम्हारे होते कैसे

हो सकता है धरती पर अँधियारा ?

तुम खुद जलकर

करते हो प्रकाश

हर घर को रोशन

जिससे होते सब आबाद.

भारत दोसी

9799467007  

 


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