Tuesday, March 25, 2025

डॉ रमेश चंद्र मीणा की शोध पुस्तक सांझ का सफर पर मेरे विचार

सांझ का सफर सरल हो जाये अगर सुबह इस पर चर्चा होती रहे

    रमेश चन्द्र मीणा की शोध पुस्तक ‘सांझ का सफर’ बुजुर्ग जीवन पर लिखी गई विचारोत्तजक रचना है. बहुत साल पहले अर्नेट हेमिग्वे का लघु उपन्यास ‘ओल्ड मेन एंड सी’ पढ़ा था बढ़ी उम्र के लोगों का जीवन बचपन और यौवन से भिन्न होता है इसको समझने के लिए संवेदनशील होना जरुरी है मीणा की इस पुस्तक में यह भरपूर है. तीन अध्याय में लिखी इस पुस्तक के पहले भाग में कुछ आलेख है फिर कहानियों  पर समीक्षा है और अंत में कुछ उपन्यासों पर.

     भारत की बात करे तो २०२२ के एक अध्ययन  के अनुसार १०.५ फीसदी बुजुर्ग है अनुमान है की २०५०   तक यह कुल आबादी में ३४.७ करोड़ हो जायेंगे. इनकी चिंता या इनके लिए जीवनयापन की व्यवस्था करना सबसे बड़ा प्रश्न है. प्राचीन संस्क्रती के बोझ तले या कहे की व्यवस्था के नाम पर बुजुर्ग घरों  में दोयम दर्जे का जीवन गुजर रहे है इस पुस्तक की कहानियां  अयोध्या बाबु सनक गए है,कबाड़, बूढी काकी,तपती सांझ लौट आओ कामरेड,वापसी, शटल आदि यही बताते है. साहित्य समाज का दर्पण माना जाता है तो यह कहानियां  समाज को दिखाती है जहा बुजुर्ग अपने ही परिवार से कटे हुए है आर्थिक रूप से मजबूत होने के बावजूद भी विवश है. 

    लेखक ने बहुत विस्तार से चिन्तन प्रस्तुत किया है २०१२ -१३ के ज्यादातर आलेख होने के बावजूद वर्तमान अनुरूप है कुछ वर्ष पूर्व एक कहानी पढ़ी थी जिसमे बेटे की उपेक्षा के चलते बुजुर्ग अपनी पूरी सम्पत्ति बेचकर होटल में रहने चला जाता है बेटे को कुछ नहीं देता है. ऐसी कहानियां भी मार्ग दिखाती है वही पश्चिम का ओल्ड एज होम का मार्ग तो है ही. लेखक ने कुछ उपन्यास रेहन पर रग्धू , समय सरगम,गिलिगडू, चार दरवेश आदि के माध्यम से विस्तार से इस विषय को उठाया है जो आज की जरुरत है.

    इस विमर्श पर बहुत कम ध्यान दिया जा रहा है. लेखक ने लिखा है “ मुक्कमल समाज तभी बनता है जब तीन पीढ़िया साथ रहती है” सात पीढियों के लिए धन संचय करने की सोच वाले समाज को एक लघु कथा हिला सकती है जिसमे बूढी माँ का चश्मा बेटा दुरुस्त नहीं करवाता है. लेखक इस बात पर चिन्तन करते है की वृद्धो का अलग समाज होता है. अंत में लेखक ने म्रत्यु पर समाज में चर्चा नहीं होने का भी मुद्दा उठाया है जो सच भी है की भारत में यह विषय अध्यात्म के भरोसे छोड़ दिया गया है. बुजुर्ग पुरुष और बुजुर्ग महिला की स्थिति भिन्न है इस बहाने स्त्री विमर्श भी विचारणीय है.चयनित कहानिया अनेक रंग दिखाती है गोविन्द मिश्र की कहानी ‘खूंटे’ का पात्र अपनी मर्जी से जीना चाहता है इसलिए अकेला रहना चाहता है वही जय जादवाणी की कहानी ‘कोई नहीं दूसरा’ की महिला पात्र अकेले रहने का अभ्यास भी नहीं करना चाहती है.लेखक ने कविता में जो बुजुर्ग है उसपर कुछ नहीं लिखा है.

   ‘शुभारम्भ’ कहानी बुजुर्गो को लिव इन रिलेशन का मार्ग दिखाती है कुछ समाजों में यह प्रचलित भी है. लेखक ने मोत के भय से बचने का उपाय स्वर्ग- नर्क, आत्मा-परमात्मा और पुनर्जन्म का जिक्र किया है अंतिम समय इश्वर का नाम और धर्म ग्रन्थ का वाचन होता है. जैन संत तरुण सागर बस्ती के मध्य श्मशान की जरूरत बताते  रहे है जिससे अंतिम सत्य से लोग परिचित हो.सेवानिव्रत हो चुके लोगों  को एक अलग ही जीवन पद्धति लेकर जीवन गुजरना चाहिए जिसमे शौक पुरे  हो और एक लक्ष्य हो.  यह पुस्तक बेहतरीन है अपने विषय को गम्भीरता से प्रस्तुत करती है बुजुर्ग को ही नहीं युवा को भी इसको पढना चाहिए.

भारत दोसी

गाँधी सद्भावना सम्मान प्राप्त लेखक  


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